September 24, 2022
Swami Vivekananda Biography In Hindi

स्वामी विवेकानंद की जीवनी । Swami Vivekananda Biography In Hindi

Swami Vivekananda Biography In Hindi – स्वामी विवेकानंद जी का जन्म कोलकाता के एक मध्यम परिवार में हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। बचपन से ही स्वामी जी का आध्यात्मिक शिक्षा में विशेष लगाव रहा था। जिसमें वे अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस जी के विचारों से काफी प्रभावित थे। अपने गुरु की मृत्यु के पश्चात उन्होंने भारतीय महाद्वीपों का दौरा प्रारंभ कर दिया। और ब्रिटिश कार्यशैली की संपूर्ण जानकारी एकत्रित की।

साल 1893 को संयुक्त राज्य अमेरिका ( शिकागो ) में आयोजित हुई विश्व धर्म सभा सम्मेलन में स्वामी जी भी शामिल हुए थे। जहां उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। अपने भाषण के दौरान स्वामी जी ने हिंदू धर्म का प्रचार प्रसार बड़े जोरों शोरों से किया था। हर एक बुद्धिमान जीव की भांति स्वामी जी भी युवाओं को देश का भविष्य मानते थे इसीलिए उनके जन्मदिवस को आज भी युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वामी विवेकानंद की जीवनी । Swami Vivekananda Biography In Hindi

पूरा नामनरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्त
जन्म12 जनवरी 1863
जन्मस्थानकलकत्ता (पं. बंगाल)
पिता का नामविश्वनाथ दत्त
माता का नामभुनेश्वरी देवी
गुरु का नामरामकृष्ण परमहंस
शिक्षा1884 मे बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण
विवाहअविवाहित
मृत्यु4 जुलाई, 1902
मृत्यु स्थानबेलूर, पश्चिम बंगाल, भारत

स्वामी विवेकानंद जी का प्रारंभिक जीवन – Swami Vivekananda Personal Life Details

एक मध्यम परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था जो पेशे से हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे तथा माता का नाम भुनेश्वरी देवी था, जो काफी धार्मिक विचारशील महिला थी। स्वामी जी और उनके परिवार का लगाव ईश्वर भक्ति में काफी अधिक था। जिस कारण वे अपना अधिकतर समय भगवान शिव की पूजा – याचना करने में व्यतीत करते थे। स्वामी जी के माता-पिता की धार्मिक विचारशीलता ने ही उन्हें अपने आध्यात्मिक व्यक्तित्व को आकार देने में सहायता मिली।

बचपन में नरेंद्र काफी चुलबुले और नटखट स्वभाव के थे। अपने स्कूल के मित्रों के साथ वे खूब हंसी – ठिठोलीयां व शरारते किया करते थे, किंतु वे पढ़ाई में भी काफी कुशल और तेज बुद्धि के थे। परिवार के धार्मिक विचारों ने स्वामी जी के भीतर बचपन से ही भगवान को पाने की लालसा जागृत कर दी थी। जिस कारण वे अपने गुरुजन तथा पंडितों से कभी-कभी ऐसे सवाल पूछ लेते जिन्हें सुनकर बड़े से बड़ा विद्वान भी असमंजस में पड़ सकता है।

स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षा – Education of Swami Vivekananda

स्वामी जी की बचपन से ही पढ़ाई में एक गहन रूचि रही थी। बचपन से ही वे एक होशियार विद्यार्थी थे, जिन्होंने हमेशा पढ़ाई को महत्व दिया। और अपनी मेहनत के दम पर ही वे ईश्वरचंद्र विद्यासागर के मेट्रोलिटन संस्थान में एडमिशन लेने में कामयाब हुए। अपनी स्कूली शिक्षा में स्वामी जी सामाजिक विज्ञान, दर्शन, धर्म इतिहास और कला जैसे विषयों के एक उज्जवल छात्र थे। विषय पुस्तकों से हटकर स्वामी जी को हिंदू शास्रों जैसे भगवद गीता, रामायण, महाभारत और वेद – पुराण में गहन रुचि थी।

इन सबके अलावा वह शारीरिक खेलकूद तथा अन्य प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया करते थे। वे ललित कला जैसी कठिन परीक्षा में भी उत्तीर्ण रहे थे। तथा 1884 में उन्होंने कला स्नातक में अपने डिग्री प्राप्त की। अपने संपूर्ण जीवन काल में स्वामी जी ने अनेक किताबों का अध्ययन किया तथा सस्पेंसर की किताब एजुकेशन (1860) का बंगाली मे अनुवाद भी किया था। अपनी स्नातक की डिग्री हासिल करने के साथ-साथ उन्होंने बंगाली साहित्य भी सीख लिया था।

Swami Vivekananda Speech In Hindi

स्वामी विवेकानंद जी की गुरु के प्रति निष्ठा

एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और अकर्मण्यता दिखाई और घृणा से मुँह फेर लिया। यह देखकर स्वामी जी बहुत क्रोधित हो गए। स्वामी जी ने उस गुरु भाई को पाठ पढ़ाया करते थे और गुरुदेव की सभी वस्तुओं के प्रति अपना प्रेम दिखाते हुए, उनके बिस्तर के पास रक्त कफ से भरी थूकदानी फेंका करते थे।

वह गुरु के प्रति निष्ठा और भक्ति की महानता के माध्यम से ही गुरु के शरीर और उनके दिव्य आदर्शों की सर्वोत्तम सेवा करने में सक्षम थे। वे गुरुदेव को समझ सकते थे, अपने अस्तित्व को गुरुदेव के रूप में विलीन कर सकते थे। भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की सुगंध पूरी दुनिया में फैलाने के लिए ऐसी गुरु-भक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति निष्ठा ही इस अद्भुत व्यक्तित्व के आधार थे!

स्वामी जी ने अपना संपूर्ण जीवन अपने गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया था। अपने गुरु के अंतिम समय में अपने घर – परिवार की नाजुक हालत और खुद के भोजन की चिंता ना करते हुए वे सिर्फ और सिर्फ अपने गुरु की सेवा में सलंगन रहते थे। स्वामी जी एक स्वपनदृष्टा व्यक्ति थे, जो हमेशा एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे जिसमें लोगों के मध्य जाति – धर्म को लेकर भेदभाव ना हो। वेदांत के सिद्धांत को भी उन्होंने इसी रूप में रखा था।

स्वामी विवेकानंद जी की यात्राएं – Swami Vivekananda’s Journeys

स्वामी जी ने 24 वर्ष की उम्र में ही गेरुवा वस्त्र धारण कर लिया था। जिसके पश्चात उन्होंने पैदल ही संपूर्ण भारत की यात्रा तय की। भारतीय यात्रा संपूर्ण करने के पश्चात स्वामी जी ने जापान के कई शहरों का दौरा किया और फिर वे चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो पहुंचे। जहां उन्होंने विश्व धर्म सभा सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उस समय यूरोपियन लोगों द्वारा भारतीय लोगों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था।

किंतु जब स्वामी जी ने अपना भाषण प्रारंभ किया तो एक भारतीय सन्यासी के विचार सून सभा में मौजूद बड़े से बड़ा विद्वान भी चकित रह गया। यह एक ऐसा भाषण था जिसने भारतीय लोगों के प्रति अमेरिकन नजरिए को बदल कर रख दिया था। सारा परिषद तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था। अब तो अमेरिका में स्वामी जी का अत्यधिक स्वागत हुआ। स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में 3 वर्ष रहे जहां उनके अनेक अनुयायी बन चुके थे। जिन्हें उन्होंने भारतीय विचार और संस्कृति का संपूर्ण ज्ञान दिया।

स्वामी जी के ज्ञान और बुद्धि को देखते हुए अमेरिकन मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू नाम से संबोधित किया। उनका विश्वास था कि “आद्यतम – विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा”।

शिक्षा के विषय में स्वामी जी के विचार – Swamiji’s Thoughts On Education

स्वामी विवेकानंद जी अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के विरोधी थे। क्योंकि वे मानते थे कि इस शिक्षा का उद्देश्य लोगों को केवल पंगु बनाना है। वे एक ऐसी शिक्षा का समर्थन करते थे जिसमें छात्र का सर्वांगीण विकास हो सके, जो उसे आत्मनिर्भर बना सके तथा अपने पैरों पर खड़ा कर सकें।

स्वामी जी ने प्रचलित शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा कहकर संबोधित किया और कहां, क्या आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हो जिसने कुछ परीक्षाएं पास कर ली हो और कुछ अच्छे भाषण दे सकता हो, किन्तु सच्चाई यह है की जो शिक्षा इंसान को जीवन संघर्ष से निपटने के लिए तैयार नहीं करती, जो व्यक्ति का चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा जैसी भावनाओं को उत्पन्न नहीं करती तथा जो शेर जैसा साहस पैदा नहीं करती आखिर ऐसी शिक्षा से क्या लाभ होगा ?

स्वामी जी सैध्यांतिक शिक्षा से अधिक व्यवहारिक शिक्षा के उपयोग पर जोर देते थे। व्यक्ति की शिक्षा ही उसे जीवन के संघर्षों और आने वाले भविष्य के लिए तैयार करती हैं इसीलिए शिक्षा में उन तत्वों की मौजूदगी आवश्यक है जो आने वाले कल के लिए महत्वपूर्ण हो।

अत: स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, “तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यवाहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धांतो के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया हैं”।

Swami Vivekananda Quotes In Hindi

स्वामी विवेकानंद जी की मृत्यु – Death of Swami Vivekananda

कहां जाता है उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा, एक ओर विवेकानंद चाहिए। शिष्यों के अनुसार अपनी जिंदगी के अंतिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी पद्धति को नहीं बदला और सुबह दो-तीन घंटे तक ध्यान किया और ध्यान अवस्था में ही ईश्वर में लीन हो गए।

बेलूर के गंगा घाट पर चंदन की लकड़ीओं के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके शिष्यों ने गंगा घाट पर स्वामी जी के सम्मान में विवेकानंद नाम का मंदिर निर्माण करवाया। और सभी शिष्य स्वामी जी के विचार भारत के कोने – कोने में पहुंचाने के लिए अपनी – अपनी दिशा में निकल पड़े। विवेकानंद जी के विचार जनमानस में प्रसारित करने के लिए 130 से भी अधिक केंद्र स्थापित किए गए।

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