December 9, 2022
Patjhad Story in Hindi

पतझड़ । हिन्दी कहानी । Patjhad Story in Hindi

Patjhad Story in Hindi
पतझड़

कभी कभार जब भी मेरा गांव आना होता तो मां के साथ खेत की तरफ निकल पड़ती। प्रकृति के संध्या में मैं बहुत-ही जीवंत महसूस करती। मां के साथ बातों-बातों में खेत की सारी पगडंडियां नाप जाती। मुझे बीच-बीच में वहां काम करने वाले मजदूरों से बातचीत करना काफी रास आता।

ऐसे ही एक बार मेरी मुलाकात खेत में काम करने वाली एक लड़की से हुई। उसके भोले मासूम चेहरे में ना जाने क्या बात थी कि उसे देख एक अपनापन-सा महसूस होता था। बड़ी ही खुशमिज्ञाज थी वो। हमेशा सबसे बड़े प्यार से बातें करतीं नाम था ‘श्यामली’। यथा नाम तथा रूप। जब वो हंसती तो उसका रूप और भी निखर जाता। वह हर काम को बड़े करीने से करती। मां के मायके के गांव से थी। इसलिए मां को उससले विशेष लगाव था। मेरी मां को वह मौसी बुलाती थी।

जब मैं मां के साथ खेत की तरफ निकलती तो वह बाकियों के साथ काम करते दिख जाती। जब भी उसकी नज्र मुझ पर पड़ती, मेरे पास आ जाती और दुनिया-जहान की बातें बताने लगती। उसकी बातों में ना जाने क्या जादू था कि मैं भी बस उनमें खो जाती थी। अपनी अम्मा को याद करते उसकी आंखें सजल हो जाया करती थीं। उसे देखकर मेरा भी दिल भर आता।

एक दिन भोजनावकाश के वक्त बह मुझसे इधर-उधर की बातें कर रही थीं। तभी किसी की बरात को गुजरते देख ना जाने किन रख्यालों में गुम हो गई। मैंने टोका तो मेरी ओर देखकर मुस्कुराई। ‘मेरा भी बियाह होवेगा, दीदी। जब मेरा मरद आवेगा तब हम भी खब सजेंगे और अपनी भाभियों के सामने जाकर इटलाएंगे। वह आंखें नचाकर बोली।

उसकी बातें सुन मेरी हंसी फूट पड़ी, ‘क्या शादी हो जाने से आदमी मजबूत हो जाता है?

‘और नहीं तो का दीदी। हमरी सारी सखियां बियाह करके अपने-अपने मरद के साथ अच्छी जिनगी बसर कर रही है। हम भी उस दिन का रास्ता देख रही है, जब हमरे जिनगी में भी ई गम का पतझड़ खतम होगा’, उस्ने कहा। हालांकि मैं उसकी बातों से सहमत न थी, पर दिल से उसके लिए दुआ की, ‘भगवान इसका दामन हमेशा खुशियों से भरा रखना।

एक बार मैं होली की छुट्टियों में घर आई तो शाम को आदतवश खेत की तरफ निकल गई। घूमते हुए खेत की छोर तक पहुंच गई पर श्यामली कहीं नजर नहीं आई। पूछ्ने पर पता चला कि वह पिछले तीन दिन से काम पर नहीं आ रही है, क्योंकि उसकी शादी ठीक हो गई है। उसकी शादी की बात सुनकर प्रसत्रता के साथ हैरत भी हुई- ‘इतनी कच्ची उम्र में शादी? मैंने मां से पूछा तो वह लोली, ‘यहां पर ऐसा ही होता है, लाडो’

शादी के चौथे दिन वह काम पर वापस लौट आई। में उसके आने की खबर सुनकर खेत की तरफ बढ़ चली। मुझे आता देख वह झटपट मेरे सामने आ गई। मैंने गौर किया। साड़ी पहने, करीने से बाल बनाए और माथे पर कुमकुम सजाए वह बहुत सुंदर लग रही थी। पहली बार बाल्यावस्था का अल्हड़पन गायब था और उसके चेहरे पर नारी सुलभ लप़जा दिख रही थी।

मैं उत्सुकतावश उससे पति-ससुराल के बारे में पूछने लगी। वह बोली, ‘पड़ोस के गांव का रहने वाला है। उ.पी. में काम करता है। वहां मनेजर है। कारतिक मास में आकर गवना कराकर मुझे साथ ले जावेगा।’ मैंने सवालिया नज्रों से मां की ओर देखा तो मां हंसकर बोली, ‘यह उत्तर प्रदेश की बात कर रही है। वहीं पर मजदूरी करता है इसका पति। फूलमती ने बताया था मुझे’ जानकर मुझे थोड़ी तसल्ली हुह। ‘चलो, भाइयों के संग न सही, अपने पति का साथ पाकर यह अब खश रहेगी।’

सही, अपने पति का साथ पाकर यह अब खुश रहेगी।’

पढ़ाई में व्यस्त रहने के कारण साल भर ‘तक मैं गांव नहीं जा पाई। मां से बात होती रहती थी, सो कभी-कभार श्यामली के बारे में भी बातें हो जाती थीं। एक बार बातों-बातों में पता लगा। कि उसका पति उसे गौना कराकर लेने वापस आया ही नहीं। उसे अपने फैक्ट्री में ही कोई दूसूरी औरत पसंद आ गई थी। यह सुनकर श्यामली के लिए बहुत बुरा लगा, ‘बेचारी, कितनी खुश थी अपनी शादी से। उसके तो सार सपने ट्रट गए।

अगले वर्ष जब होली की छुट्टी में मेरा पुनः गांव आना हुआ तो श्यामली से मिलने की आस लेकर मैं खेत की तरफ चल पड़ी। ख़यालों में गुम मेरा मन जाने क्या-क्या सोचने लगा, ‘उससे क्या कहूंगी, कैसे दिलासा दूंगी आदि-आदि। तभी खेत की मेड़ पर कोई मेरी ओर आता दिखा। गौर से देखा तो श्यामली ही थी। नई साड़ी, पायजेब, मांग में सिंदूर, होठों पर पाली और कांच की ढेर सारी रंग-बिरंगी चूड़ियां पहने वह मेरे सामने हाजिर थी। ‘अरे वाह, तू तो बहुत जंच रही है।’ मैं बोली

‘मेरा मरद आया है दीदी। इस बार हमको भी साथ ले जावेगा।’

उसे खुश देख मुझे थोड़ी हैरत भी हुई। अपने पति की इतनी बड़ी गलती वह इतनी आसानी से कैसे माफ़ कर सकती है। ‘तूने माफ़ कर दिया उसे?” मैंने क्रोधमिश्रित स्वर में पूछा।

‘और क्या करती दीदी? कितने दिन भाई-भौजाई के दुआर पर पड़ी रहती। और फिर मेरे मरद को अपनी गलती का पछतावा है। उसने हमसे माफ़ी भी मांग ली है।

मैं उसकी बात बीच में ही काटकर बोली, ‘और तूने माफ़ भी कर दिया?’

हां, और कितना परेशान करती ? मरद तो भगवान का रूप होवत है, दीदी’

मैं उत्तर सुनकर आश्चर्यचकित थी। घर आकर जब मैंने मां को सब बताया तो उनको सुकून हुआ – ‘चलो, अब दुख दूर होंगे उसके। बहुत कष्ट देखे हैं इस बेचारी ने इतनी कम उम्र मैं ही।’ मैंने भी सहमति में सिर हिलाया।

‘कल से हम काम पर नहीं आएंगे। छुटकी दौदी बहुत अच्छ है। उनकी बहुत याद आएगी’, भाबुक होते हुए उसने कहा।

‘अपना ख्याल रखना’, मां ने उसे आशीष देते हुए कहा। चार दिन गुज्तर गए। एक दिन मां के साथ खेत की तरफ निकल पड़ी। यूं ही पगडंडियों पर बढ़ते मेर कदम किसी को देख ठिठक पड़े। ‘यह तो श्यामली है। मैंने उसे आवाज लगाई। उसके पास आते ही जैसे ही उस पर नज्र पड़ी, दिल धक्क-सा रह गया। सूनी मांग और सूनी कलाई। लगभग चिल्लाकर पूछा, ‘अरे श्यामली, यह कैसा रूप बना रखा है तूने ? तू तो अपने ससुराल जाने वाली थी न। यहां क्या कर रही है?

उसका गला भर आया। सिर नीचे करके धीरे से बोली, ‘हमरी खुसियों को जाने किसकी नजर लग गई दीदी। कल बाजार जाते वक्त हमरे मरद को किसी बस ने कुचल दिया।

मैं अवाक् होकर उसका चेहरा देखने लगी। कुदरत किसी के साथ इतना बेरहम कैसे हो सकता है। उसके दामन में खुशियां आते-आते रह गई। मैं निःशब्द हो गई।

बुझे स्वर में उसने कहा, ‘हम गरीबन की किस्मत भी बिनां स्याहीं की कलम से लिखी गई है दीदी।’ इतना कहकर जाने लगी। मैं स्तब्ध होकर उसकी ओर देखती रह गई और वह निर्विकार भाव से अपने काम में लग गई।

कहानी लेखिकामोनिका राज ( युवा कहानीकार )

आशा करते है कहानी आपको पसंद आई होगी। दोस्तो कृपा कमेंट के माध्यम से जरूर बताइगा की “पतझड़” कहानी आपको कैसी लगी ?

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