September 24, 2022
Kabir Das Biography In Hindi

संत कबीर दास का जीवन परिचय । Kabir Das Biography In Hindi

Kabir Das Biography In Hindi – दोस्तों आज भी कबीर दास को एक महान धर्म सुधारक कभी और संत के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म 14वीं शताब्दी के अंत में काशी में हुआ था। जिस समय मध्यकालीन भारत पर सैय्यद साम्राज्य का शासन हुआ करता था।

कबीर दास जी ने अपनी रचनाओं और कविताओं के माध्यम से सामाजिक बुराइयों को दूर किया। इसी विचारधारा ने उन्हें समाज सुधारक की उपाधि प्रदान की। जब उन्होंने अपनी कविताओं में जाति-धर्म से ऊपर उठकर जीवन को व्यवहारिक बनाने की नीति लिखी तो हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों ने उनकी कड़ी आलोचना की।

लेकिन उनकी मृत्यु के बाद हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के मध्य यह मतभेद चलता रहा की संत कबीर दास केवल हमारे धर्म से ताल्लुक रखते है। कबीर दास भक्ति काल के कवि थे जो वैराग्य धारण करते हुए निराकार ब्रह्म की पूजा का उपदेश देते थे। जो आज भी उनकी रचनाओं में झलकती है। कबीर दास का समय कवि रहीम जी के समय से पहले का है।

कबीर दास का जीवन परिचय । Kabir Das Biography In Hindi

पूरा नाम संत कबीर दास
जन्म1398 ईसवी.
पालनहारी मातानीमा
पालनहारी पितानीरू
मुख्य रचनाएँरमैनी, साखी, सबद
प्रसिद्धि का कारणसमाज-सुधारक, कवि, संत
मृत्यु1518 ईस्वी, मगहर, उत्तर-प्रदेश
उम्र120 वर्ष

कबीर दास जी का प्रारंभिक जीवन – Kabir Das Personal Life Details

भक्ति काल के कवि कबीर दास जी का जन्म 1398 ईसवी को काशी उत्तर प्रदेश में हुआ था। लेकिन कई इतिहासकारों का मानना है कि कबीर दास जी का जन्म 1440 ईस्वी में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था। जिसने समाज के डर और शर्म से अपने शिशु को छोड़ने का फैसला किया और अपने अपने ही बच्चे को एक टोकरी में डालकर लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया।

उस तालाब के पास नीरू नीमा नामक पति पत्नी रहते थे। जिनकी कोई संतान नहीं थी। रोते हुए बच्चे की आवाज सुनकर दोनों पति पत्नी तालाब की ओर दौड़े और एक छोटे बच्चे को भूख और प्यास से तड़पते हुए रोते देखा। भगवान का प्रसाद समझकर दोनों पति-पत्नी नीरू और नीमा ने बच्चे का पालन पोषण किया। इतिहासकार बताते हैं कि नीरू और नीमा मुसलमान थे इसीलिए कबीर दास जी का शुरुआती जीवन एक मुस्लिम परिवार में बीता।

कबीर दास जी की शिक्षा – Education of Kabir Das

कबीर दास जी एक अनपढ़ व्यक्ति थे, क्योंकि उनकी पारिवारिक आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था। कहां जाता है कबीर दास जी को किताबी ज्ञान में अधिक रूचि नहीं थी, जिस कारण उन्होंने किसी भी पाठशाला जाना मुनासिब न समझा। उन्होंने जो भी सीखा अपने अनुभव और समाजिक विचारधारा से सीखा। अपने गुरु सद्गुरु रामानंद की कृपा से उन्होंने आत्मज्ञान और ईश्वरीय भक्ति का सही अर्थ समझा।

कबीर दास जी की रचनाएँ – Works of Kabir Das

कबीर दास जी ने अपनी सरल और सहज रचनाओं के माध्यम से सभी सामाजिक अंधविश्वासो का शांतिपूर्वक विरोध किया है। उन्होंने समाज में बढ़ रही ऊंच-नीच, छुआछूत, जातिगत भेदभाव और धार्मिक भेदभाव को मिटाने के लिए कई रचनाएं लिखि। अपनी रचनाओं में उन्होंने जीवन को सही ढंग से जीने और उसका सही तरीके से निर्वाह करने का नियम भी बताया है जो कि मानवीय दृष्टि से अमूल्य है।

कबीर दास जी की कृतियों के मुख्य संकलन को बीजक कहा जाता है। चालान में तीन भाग होते हैं –

साखी – इसका अर्थ है धर्म का उद्देश्य जिसमें कबीर दास जी की शिक्षा और सिद्धांतों का जिक्र हमें कई बार देखने को मिला है।

सबद – सबद को कबीर दास जी की रचनाओं में सबसे उत्तम माना जाता है क्योंकि इसमें प्रेम व अंतरंग साधना का जिक्र किया गया है।

रमैनी – इसमें कबीर दास जी ने कुछ दार्शनिक एवं रहस्यवादी बातों का जिक्र किया है। जिसमें चौपाई छंद का उल्लेख किया गया है।

कबीर दास जी की गुरु शिक्षा – Guru Shiksha of Kabir Das

कबीर दास जी का पालन – पोषण एक मुस्लिम परिवार में हुआ जो कि काशी उत्तर प्रदेश में रहते थे। इस वक्त संत कबीर दास जी अपने जीवन की उस अवस्था में पहुंच चुके थे जब उन्हें अपने आगे के जीवन को समझने के लिए एक गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक था। कुछ समय पश्चात वही काशी में उन्हें गुरु रामानंद के बारे में पता चला।

गुरु रामानंद उस समय के सबसे विद्वान हिंदू संतो में से एक थे। गुरु रामानंद काशी में अपने शिष्यों और जनता को भगवान विष्णु के प्रति प्रेम का उपदेश देते थे। उनकी धार्मिक शिक्षा के अनुसार ईश्वर हर इंसान और हर एक चीज में विराजमान है। अब कबीर दास जी गुरु रामानंद के शिष्य बन चुके थे और दिन प्रतिदिन उनकी शिक्षाओं को सुना करते थे। अब संत कबीर दास जी का रुझान भी धीरे-धीरे वैष्णववाद की तरफ मुड़ने लगा था।

वे वैष्णववाद के साथ-साथ सूफी विचारधारा को भी भली-भांति जानते थे। इतिहासकारों का मानना है कि कबीर दास गुरु रामानंद की दृष्टि में संत बने और श्री राम को अपना भगवान बनाया।

कबीर दास जी की मृत्यु – Death of Kabir Das

विद्वानों का मानना है कि संत कबीर दास जी की मृत्यु 1518 ईस्वी में 120 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश राज्य के मगहर शहर में हुई थी। कहां जाता है कि उनकी मृत्यु शय्या लेने के लिए हिंदू व मुस्लिम दोनों धर्मों के लोग आए थे। हिंदुओं का मानना था कि कबीरदास जी हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते हैं और वहीं दूसरी तरफ मुसलमानों का मानना था कि वह मुसलमान धर्म से है। इसी विचारधारा ने इन दोनों धर्मों के बीच तनाव को ओर बढ़ा दिया।

अंत में दोनों धर्मों द्वारा मिलकर यह फैसला लिया गया कि कबीर दास जी के आधे शरीर का अंतिम संस्कार हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों से किया जाएगा और आधे शरीर का अंतिम संस्कार मुसलमान धर्म के रीति-रिवाजों से किया जाएगा। जब यह निर्णय लेने के पश्चात संत कबीर दास जी के मृत शरीर से चादर हटाई गई तो उनके मृत शरीर पर कई फूल मिले। ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर सभी को यकीन हो गया की कबीर दास जी स्वर्ग में चले गए।

अंत में दोनों धर्मों के लोगों ने बड़े प्यार से फूलों को आधा-आधा विसर्जित कर कबीर दास जी का अंतिम संस्कार किया। आज उस जिले को संत कबीर नगर से जाना जाता है, जहां उनकी मृत्यु हुई थी।

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